जय जिनेन्द्र 🙏अभी बंद है, ६:०० pm बजे खुलेगा
तेरहवें तीर्थंकर, इस क्षेत्र के मूलनायक।
विमलनाथ इस अर्धकाल के चौबीस तीर्थंकरों में तेरहवें हैं। नाम 'विमल' से आया है, जिसका अर्थ है निर्मल, और इस क्षेत्र के लिए रचे गए पूजन में यही शब्द बार बार लौटता है।
नीचे दिए गए विवरण वे हैं जो परंपरागत तीर्थंकर सूचियों में अंकित हैं। इनमें व्यावहारिक महत्व लांछन का है: दिगंबर प्रतिमाएँ जानबूझकर एक जैसी होती हैं, अतः पीठिका पर उत्कीर्ण लांछन ही किसी तीर्थंकर की पहचान है, और विमलनाथ का लांछन वराह है।

श्री १००८ विमलनाथ भगवंत की प्रतिमा चतुर्थकालीन मानी जाती है और अत्यंत सुरेख एवं सूक्ष्म रूप से उत्कीर्ण है। महाराष्ट्र में यही एकमात्र अतिशय क्षेत्र है जिसके मूलनायक विमलनाथ हैं।
स्थापत्यकार, इतिहासविद् एवं यात्री, जो इसके सम्मुख खड़े हुए हैं, बार बार और बिना पूछे कहते रहे हैं कि ऐसी प्रतिमा उन्होंने अन्यत्र नहीं देखी। इसके चारों ओर का गर्भगृह हेमाडपंथी है, और उसमें अन्य अनेक तीर्थंकर प्रतिमाएँ भी रखी हैं।
प्रतिमा बलुआ पत्थर से उत्कीर्ण है, लगभग तीन फुट ऊँची, पद्मासन में विराजमान, मुखमुद्रा शांत एवं सूक्ष्मता से गढ़ी हुई। इसके साथ अष्टप्रातिहार्य, अर्थात कुछ प्राचीनतर तीर्थंकर प्रतिमाओं के परितः दिखने वाले आठ मांगलिक चिह्न, उत्कीर्ण नहीं हैं।
तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ बाईं ओर हैं, सप्तफणी सर्प-छत्र सहित, दोनों ओर हाथी एवं देवगण उपस्थित। दाईं ओर कायोत्सर्ग मुद्रा, अर्थात ध्यान की खड़ी मुद्रा में एक तीर्थंकर प्रतिमा है। वेदी के चारों ओर अन्य कोनाड़ों में पद्मासन एवं कायोत्सर्ग दोनों मुद्राओं में तीर्थंकर प्रतिमाएँ हैं, जिनमें चौबीसों तीर्थंकरों को एक साथ दर्शाने वाला एक फलक भी है।
इस प्रतिमा के विषय में समाज का कथन यह है कि उसका मुख एक ही भाव नहीं रखता। दर्शन करने वाले बताते हैं कि प्रातः हल्का स्मित, दोपहर में गंभीर एवं स्थिर भाव, और संध्या को पुनः वही स्मित।
नित्य आने वाले इससे सरल बात भी कहते हैं: गर्भगृह में प्रवेश करते ही मन के विकार शांत होने लगते हैं, और जो शेष रहता है वह वही भाव है जिसे परंपरा 'निस्सही, निस्सही' कहती है, अर्थात आत्मा का अपना अपरिग्रही स्वभाव। पुस्तक इसे यहाँ पूजा करने वालों का अनुभव कहकर अंकित करती है, और यहाँ भी वैसे ही अंकित है।
नगर के जेष्ठ श्रावक एवं वृद्ध नागरिक यह वृत्तांत सुनाते हैं कि प्रतिमा समाज तक कैसे पहुँची। यह अभिलेख नहीं, आख्यायिका है, और पुस्तक भी इसे वैसे ही प्रस्तुत करती है।
जिस भी सत्ता ने अंबाजोगाई को अपने अधीन रखा, उसके लिए यह नगर लष्करी ठाणा रहा; यादवों के अधीन खोलेश्वर की सेना से लेकर ब्रिटिश एवं निजाम तक। वृद्ध नागरिक आज भी उँगली से वे स्थान दिखाते हैं जहाँ छावनियाँ थीं। हैदराबाद के निजाम के अधीन यहाँ गोलकोंडा लान्सर नामक सैनिक टुकड़ी थी।
उसी टुकड़ी का एक अधिकारी अपने निवास के पास के एक छोटे उंचवटे पर पैर रखकर घोड़े पर चढ़ता था। उसी उंचवटे के नीचे भूगर्भ में यह प्रतिमा विराजमान थी। वृत्तांत कहता है कि प्रतिमा ने उसके स्वप्न में आकर कहा कि मुझे मेरे जैन बांधवों के स्वाधीन कर दो। इसके पश्चात अधिकारी ने भूमि खुदवाकर प्रतिमा निकाली और श्रद्धापूर्वक नगर के जैन समाज को सौंप दी। तत्पश्चात विधिवत उसकी मंदिर में प्रतिष्ठापना हुई।
मूलनायक के दर्शन प्रतिदिन प्रातः एवं सायं होते हैं। नित्य अभिषेक एवं शांतिधारा प्रातः आठ बजे तथा संध्या आरती सायं सात बजे होती है। पूर्ण दैनिक समय 'पधारें' पृष्ठ पर दिया है।